हर कोशिश नाकाम हुई उन्हें अपना बनाने की, कमी हममे थी या उनकी ख्वाइशें बडी थी, हम झुकते गए उनकी मोहब्बत में औऱ आज टुकड़ो में बिखरे से है, वो कमजोर बता आगे बड़ गए हम वही रुके से है

कोशिशें हज़ार की उन्हें भुलाने की पर उनकी याद तड़पा ही जाती है, करवटे बदलते है रात भर ना जाने नींद कहा चली जाती है, चाह तो हमदम बनकर रहने की थी ,पर यह नामुराद दुनियां कब दिलो को सकूँ से रहने देती है, अब आप ही कुछ रास्ता दिखाए सनम हम तो उम्र भर सिर्फ आपके रहना चाहते है

वो एक बार पुकारे ये सोच के कदम उठाया हमने, उस एक आवाज़ की उम्मीद में कितनी दूर निकल आये उनसे, अब क्या रिश्ता कहेंगे उनसे मिलेंगे वो अगर, सांसो के जैसे बसते थे इस जिस्म मे जो रूह बनकर

ना मौसम रुका ना नदियों का पानी रुका, अगर वो ना ठहरे एक जगह तो उनकी ख़ता क्या बदल गए हैं ऐसा दोष उन्हें क्यों दे ,हम ही कुदरत का नियम ना समझे इसमें उस रब की गलती क्या

तेरी चाहत का ऐसा सरूर हमपे छाया है, पतझड़ में भी सावन नज़र आया है, कोई पूछे अगर हमसे क्यों तेरा नाम लेने से शरमाते है,पर यह सच है हर पल तेरा ही नाम गुनगुनाते है

कैसे करे यकीन वफ़ा पर उनकी अब वो ही बताये, कहने को सिर्फ करते हमसे ही है प्यार, पर जहाँ जाती है नज़र हर कोई है उनका यार,

उलझे उलझे से है इन रिश्तों की डोर से, रिश्ते है या कुछ और है यह भी ना समझे है, बस यूही चलते चले जा रहे हम ना जाने किस ओर है,

वक़्त कब करवट लेगा कब हकीक़त को समझेंगे, जो पास अपने दिखता है वो सपना है या मृगतृष्णा, कोई आइना दिखा दे यह जो दिखती है, रूह है अपनी या कोई और है

कौन समझा है हमे जो अब समझेगा, वक़्त है यूही बीत जायेगा, तन्हाईयों में उलझे उलझे से है, एक दिन इन साँसों की कैद से सुलझ कर यह पंछी उड़ ही जाएगा

इश्क़ है हमसे तो कभी जताया भी करो, हम क्या समझे खामोशी की जुबां कभी लफ़्ज़ों में मोहब्बत पिरो के गुनगुनाया भी करो, कैसे माने की हम दिल में बसते है धड़कनो की धुन कभी सीने से लगा के सुनाया भी करो

इस रूह की शायरी तुम, इस दिल की धड़कन तुम ,हो ना सके कभी एक जो उस नदी के दो किनारे हम तुम