नजदीक ना आओ के जल जाएंगे हम, दूर ना जाओ की बुझ जाएंगे हम, जलने दो इस आग को यूही दिलो के दरम्यान , हम तुम सुलगते रहे रात भर यूही, सुबह दो नही एक नज़र आएंगे हम

लहूलुहान है यह रूह आज जो ये जिस्म बेपर्दा है, किससे करे कबूल गुनाह अपना हम तो आईने से भी शर्मिंदा है

जो बीत गयी वो रात थी, जो खत्म हुई वो बात थी, किसने देखा क्या क्या टूटा ,जो समेटे है वो कांच नही दिल के टुकड़े है , वफ़ा के बदले बेवफाई क्या यही उनकी चाहत थी

जब से हुई है तुमसे मोहब्बत, यह रूह तुम्हारी ख़ुशबू से महकने लगी है, दुनियां ने जब भी इत्र का नाम पूछा, ना जाने क्यू शर्म से नज़रे झुकने लगी है

मेरा हर रास्ता क्यों उन्ही की राहो से जा मिलता है, जितना रहती हूं दूर उनसे उतना ही दिल उन्हें याद करता है, हमे तो यह आदत लगती है उनकी ,पर दुनियां को ये प्यार लगता है

हर खवाइश पूरी हो यह ज़रूरी तो नही, यह सोच हमने उन्हें अपना बनाने को ख्वाइश नही मकसद बना लिया है